बुधवार, फ़रवरी 17, 2010

सीबीआई जांच के लिए सरकार की अनुमति जरूरी नही


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्ट लोकसेवकों और राजनीतिक पहुंच रखने वाले समाज विरोधी तत्वों के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए व्यवस्था दी है कि संबंधित राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बगैर भी हाईकोर्ट सीबीआई जांच का आदेश दे सकते हैं। शीर्ष कोर्ट के चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन नीत पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को यह अहम व्यवस्था दी।


शीर्ष कोर्ट ने सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार तथा राजनीति का अपराधीकरण रोकने की कोशिश के तहत अपनी व्यवस्था में कहा कि एक बार हाईकोर्ट को यह भरोसा हो जाए कि राज्य की जांच एजेंसियां किसी मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष काम नहीं कर रही हैं तथा मुजरिम को बचाने की कोशिश में हैं, तो राज्य के विरोध के बावजूद वह सीबीआई को मामले की जांच का आदेश दे सकता है।

बेंच ने कहा कि इन शक्तियों का राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय महत्व के अपवादस्वरूप व असाधारण मामलों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अन्यथा सीबीआई के पास रोजमर्रा के मामलों का ढेर लग लग जाएगा।

शीर्ष कोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के मौलिक अधिकारों के संरक्षक हैं। प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच का हक है। राज्य को अपराध या अधिकारों के दुरुपयोग का शिकार बने व्यक्ति को ऐसी जांच के जरिए न्याय पाने से वंचित करने का हक नहीं है।

बेंच ने यह व्यवस्था पश्चिम बंगाल सरकार तथा अन्य द्वारा पेश याचिकाओं पर दी। इन याचिकाओं में कहा गया था कि दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट एक्ट के प्रावधानों के तहत किसी राज्य में सीबीआई तभी जांच कर सकती है जब संबंधित सरकार उसे पूर्व अनुमति दे।

शीर्ष कोर्ट ने इस व्यवस्था के मार्फत वह संरक्षण हटा लिया है जिसके तहत सत्तारूढ़ नेता सीबीआई का आग्रह ठुकरा कर अपने आदमियों को बचाने के लिए कथित रूप से अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं।

बादल मामला: प्रकाश सिंह बादल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि यदि किसी लोकसेवक पर भ्रष्टाचार और घूसखोरी के आरोप हैं तो उस पर मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी की जरूरत नहीं है क्योंकि आधिकारिक रूप से ड्यूटी पूरी करने और भ्रष्टाचार में कोई संबंध नहीं है।
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाएगा यह फैसला



             भोपाल के राजभवन में मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में शपथ लेते पी.पी. तिवारी


एतिहासिक फैसले के लिए याद किए जाएंगे पीपी तिवारी

रवींद्र जैन

भोपाल। मध्यप्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त पीपी तिवारी एक बार फिर से चर्चा में हैं। सोमवार को उन्होंने मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में एतिहासिक फैसला सुनाकर मप्र के इतिहास में एक नया पृष्ठ जोड़ दिया है। अब प्रदेश की निरंकुश नौकरशाही को अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा जनता के सामने रखना होगा। लेकिन तिवारी को हम केवल इस एतिहासिक निर्णय के लिए ही नहीं, बल्कि इस निर्णय से पहले स्वयं की सम्पत्ति का ब्यौरा मुख्य सूचना आयुक्त की बेवसाइट पर डालने के लिए उन्हें प्रणाम कर रहे हैं। तिवारी इससे पहले मप्र के तत्कालीन विवादस्पद लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल से विवादों के कारण चर्चा में आए थे। दयाल सूचना के अधिकार के तहत तिवारी द्वारा दिए जा रहे एक निर्णय को बदलवाने के लिए तिवारी के घर पहुंचे थे, लेकिन तिवारी ने उनकी शिकायत थाने में करके लोकायुक्त जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के इन प्रयासों पर पानी फेरकर खूब वाहवाही लूटी थी।

क्या था मामला

मप्र कांग्रेस विधायक दल के उपनेता चौधरी राकेश सिंह ने राज्य मंत्रालय में सूचना के अधिकार के तहत प्रदेश के आईएएस व आईपीएस अधिकारियों की सम्पत्ति से संबंधित वह जानकारी मांगी थी, जो यह अधिकारी प्रतिवर्ष सरकार को उपलब्ध कराते हैं। जैसे कि उम्मीद थी, प्रदेश की नौकरशाही ने विधायक को जानकारी देने से यह कर इंकार कर दिया कि उक्त जानकारी देने से अधिकारियों की निजता का अतिक्रमण होगा। चौधरी ने मंत्रालय के अपीलीय अधिकारी के सामने अपील की, लेकिन उन्होंने भी चौधरी की अपील को खारिज कर दिया।
चौधरी ने मुख्य सूचना आयुक्त का दरवाजा खटखटाया। मुख्य सूचना आयुक्त पीपी तिवारी ने इस संबंध में आईएएस व आईपीएस अधिकारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया। कई अधिकारियों ने अपनी सम्पत्ति के बारे में जानकारी देने पर आपत्ति की, लेकिन ओपी रावत जैसे आईएएस अधिकारी तो सुनवाई के दौरान ही अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा लेकर पहुंचे थे तथा उसे सार्वजनिक करने के लिए अपनी सहमति भी दे आए थे। इसी प्रकार पुलिस महानिदेशक एसके राउत ने भी सम्पत्ति का ब्यौरा देने की सहमति प्रदान कर दी थी। कुछ अधिकारियों ने इस संबंध में विरोध किया तो चौधरी ने एक ही तर्क दिया कि - जब जनप्रतिनिधियों को चुनाव लडऩे से पहले अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा देना जरूरी है, तो लोकसेवक अपनी सम्पत्ति को कैसे छुपा सकता है।

उदारण बने तिवारी

इस सुनवाई के दौरान तिवारी ने महसूस किया कि मुख्य सूचना आयुक्त को भी अपनी सम्पत्ति को ब्यौरा सार्वजनिक करना चाहिए। तिवारी ने इस प्रकरण में फैसला सुनाने से पहले मुख्य सूचना आयोग की बेवसाइट पर पहले अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा डाला, इसके बाद 15 फरवरी 2010 को उन्होनें अपने एतिहासिक फैसले में न केवल सरकार को निर्देश दिए कि -आईएएस, आईपीएस अधिकारियों की जानकारी विधायक राकेश चौधरी 15 दिन में को निशुल्क उपलब्ध कराएं, बल्कि उन्होंने सरकार को यह भी निर्देश दिया कि - लोकसेवकों पर जनता की निगरानी के सभी लोकसेवकों की सम्पत्ति की जानकारी उनकी विभागीय बेवसाइट पर डाली जाए। तिवारी का फैसला आने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंत्रालय में आनन फानन में पत्रकार वार्ता बुलाकर घोषणा कर दी कि - प्रदेश के सभी मंत्री भी अपनी सम्पत्ति को ब्यौरा हर साल विधानसभा के पटल पर रखेंगे। इसके अलावा मुख्यमंत्री ने सभी लोकसेवकों की सम्पत्ति को बेवसाइट पर डालने के आदेश भी जारी कर दिए। अब मप्र के तृतीय वर्ग तक के सभी अधिकारी कर्मचारियों को हर साल अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा अपने विभाग की बेवसाइट पर डालना होगी।